ग्रहों का वास्तु सम्बन्ध

आधुनिक परिपेक्ष में वास्तु का विकृत रूप, कुछ वास्तुशास्त्रीयों के द्वारा परोसा जा रहा है। फेंगशुई और वास्तु को सम्मलित कर गलत शलत ज्ञान बहुत ही महंगें रूप में पढ़ाया जा रहा है जिसका ग्रन्थों में दूर दूर तक कोई वर्णन नहीं है। ग्रन्थों में पैंतालिस देवताओं की पूजा, बली, मण्डल विधान और उसमें देवताओं के रंगों का जिक्र भी शामिल है। परन्तु आधुनिक वास्तु में वास्तुपुरूष पर उपस्थित देवताओं के रंगों को लेकर नया मनगढं़त ज्ञान दिया जा रहा है। खैर प्रस्तुत लेख में नवग्रह व ज्योतिष का वास्तु में उपयोग को लेकर कुछ संकेतों को प्रदर्शित किया जा रहा है।

भवन निर्माण से पूर्व सूर्य ग्रह का योगदान :

किसी भवन के निर्माण से पूर्व नींव की दिशा भी आसमान में स्थित सूर्य की राशि के द्वारा निर्धारित होती है। यदि सूर्य सिंह, कन्या व तुला राशि में स्थित हो तो अग्नि कोण में, वृश्चिक, धनु व मकर राशि के सूर्य में ईशान कोण, कुंभ, मीन व मेष राशि स्थित सूर्य में वायव्य कोण में, तथा वृष, मिथुन व कर्क राशि में स्थित सूर्य की स्थिति में नैऋत्य कोण में नींव लगाई जाती है। इसे ज्योतिष में खात चक्र कहते हैं और राहु पृष्ठ पर लगी नींव मकान को एक दृढ़ता प्रदान करती है। साथ में सही मुहूर्त में मकान का कार्य शुरू करने से भवन कार्य में शुभता और सफलता प्राप्त होती है।

गृह आरम्भ के लिये शुभ नक्षत्र :

अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, उत्तराभाद्रपद और रेवती- ये नक्षत्र गृहारम्भ में श्रेष्ठ माने गए हैं।

भवन से शुभता प्राप्ति की उम्र और ज्योतिष:

अक्सर लोग कहते है कि इसी मकान में हमारी पुरानी पीढ़ीयों ने उन्नत्ति की परन्तु हम कष्ट प्राप्त कर रहें हैं। वैसे तो वास्तु में भवन की आयु के अनेक सूत्र है परन्तु यहाँ हम भवन की शुरूआत के ग्रह रचना का ही उल्लेख कर रहें हैं।

80 साल का भवन : भवन निर्माण की कुण्डली में लग्न से 10 वें भाव में चन्द्र, 4 थे भाव में बृहस्पति, 11 वें भाव में मंगल व शनी हों तों भवन का स्वामी निश्चित रूप से उस भवन में 80 साल तक सुखों से भरपूर रहता है।

100 साल का भवन : यदि लग्न में गुरू, 7 वें भाव में बुध, 3रे भाव में शनि और 6ठे भाव में शुक्र अथवा लग्न में शुक्र, 10वें भाव में बुध, गुरू केन्द्र में (4,7,10) और 11वें भाव में सूर्य के होने से भवन 100 सालों तक सुख प्रदाता बनता है।

200 साल का भवन : यदि शुक्र लग्र में, गुरू 5वें भाव में, सूर्य 3रें भाव में और मंगल 6ठें भाव में स्थित हो तो भवन 200 बर्षों तक सुख देने वाला होता है।

600 साल का भवन : चन्द्रमा लग्र में, गुरू सातवें में, बुध या शुक्र दसवें भाव में हो तो वह घर या शहर में 600 वर्ष शुभता बनी रहती है। यदि बुध स्थिर लग्र में मौजूद रहता है तो भी उस घर की आयु छ: सौ वर्ष पर्यन्त रहती है।

800 साल का भवन : यदि शुक्र लग्न में स्थित हो और बृहस्पति स्थिर राशी में स्थित हो तो घर वह घर दीर्घायु होता है।

1000 साल का भवन : सूर्य लग्न में, गुरू सप्तम में, चन्द्रमा दसवें में हो तो ऐसा घर हजार साल में भी अपनी शुभता नहीं त्यागता।

भवन की दिशा राशी अनुसार :

मुख्यत : वास्तु में उत्तरमुखी व पूर्वमुखी मकान को शुभता के आधार पर प्रमुखता दी गई है। जिसमें मकान उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर उंचा और पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर उंचा होना चाहिये।

पूर्वमुखी मकान : जिन लोगों का लग्न वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन या मेष हो उनकों पूर्वमुखी मकान में निवास करना चाहिये। ऐसे मकान में रहना उनके लिये शुभता प्रदान करता है।

उत्तरमुखी मकान : जिन लोगों का जन्म लग्र वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या या तुला हो, उनको उत्तरमुखी मकान ज्यादा शुभता प्रदान करता है।

ग्रहों के अनुसार कमरों का निर्धारण :

हमारी दशों दिशाओं का सम्बन्ध ज्योतिष के ग्रहों से होता है। चार मुख्य दिशाऐं व चार दिशाओं के कोण मिलाकर आठ दिशाए बनती है। उपर आकाश व नीचे पाताल की दो दिशओं को जोडक़र दश दिशओं का निर्माण होता है। मुख्यत: हम आठ दिशाओं में अपने कमरों का नियोजन करतें है तो उन दिशओं के स्वामी ग्रह व उनके देवता अनुसार निर्धारण करेगें।

क्र संख्यादिशास्वामी ग्रहदेवताकमरारंग
1पूर्वसूर्यइन्द्रड्राईंग रूमनारंगी
2दक्षिण-पूर्व (आग्रेय)शुक्रअग्निरसोईसफेद
3दक्षिणमंगलयमबेडरूमलाल
4दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य)राहूनैऋतीपुरानी वस्तुओं का संग्रहसलेटी
5पश्चिमशनिवरूणडाईनिंग हालनीला
6उत्तर-पश्चिम (वायव्य)चन्द्रवायुअन्न का भण्डारक्रीम
7उत्तरबुधकुबेरधन, तिजोरीहरा
8उत्तर-पूर्व (ईशान)गुरूशिवपूजापीला
9,10आकाश, पातालकेतु

भवन में ग्रहों का अधिकार क्षेत्र :

भवन की वास्तु में और उसमें रक्खें सामान पर किसी न किसी ग्रह का प्रभाव है- यह जानने के बाद वास्तु में हम इसकी उपयोगिता को और प्रभावी बना सकते है।

सूर्य- प्रकाश, उजाला, दिया, धूप, अधिकार, सरकारी काम में आने वाली वस्तुएँ और साधन।

चंद्र- जल, जल के साधन, दूध आदि।

मंगल- खानपान की चीजें, डाइनिंग हॉल, हथियार आदि।

बृहस्पति- हवा का आवागमन, कमरे के दरवाजे, पूजा की सामग्री, घर का पूजा स्थान।

शुक्र- कच्ची दीवार, मनोरंजन के साधन, पत्नी या प्रेमिका, संगीत के साधन, जवाहरात इत्यादि।

शनि- कूड़ा-करकट, काले रंग के पशु, लोहे का सामान।

राहु- घर की ड्रेनेज लाइन, सेप्टिक टैंक, रसोई घर का धुआं बाहर जाने के लिए बनाई गई चिमनी।

केतु- घर में सबसे कम प्रकाशवाली जगह या अंधेरी कोठरी।

जन्मकुण्ड़ली में चौथा भाव (जमीन, मकान, वाहन का सुख)

(1) जिसकी जन्मपत्रिका में चौथे भाव में बुध, शुक्र व चन्द्रमा स्थित हों वह अपने जीवन में जमीन, मकान व वाहन का सुख भोगता है।

(2) यदि किसी की कुण्डली में चौथे भाव में ग्रहण योग बन रहा हो तो पितृ दोष या घर पर किसी साये का असर वास्तु का पूण सुख नहीं लेने देते।

(3) जातकत्वम् 4/87 के अनुसार चतुर्थेश किसी शुभ ग्रह के साथ युति करके केंद्र- त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) में हो तो ऐसे व्यक्ति का अपने स्वयं की मेहनत का बनाया हुआ उत्तम मकान होता है और मकान में सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ होती है।

(4) जातकतत्वम् 4/86 के अनुसार लग्नेश चतुर्थ स्थान में हो और चतुर्थेश लग्न में हो तो यह योग बनता है। इस योग में जन्मा जातक अपने स्वयं के पराक्रम व पुरुषार्थ से स्वयं का मकान (भवन) बनाता है।

(5) चतुर्थ भाव में यदि चंद्र और शुक्र हो अथवा चतुर्थ भाव में कोई उच्च राशिगत ग्रह हो, चतुर्थेश केंद्र त्रिकोण में हो तो ऐसा जातक बड़े बंगले व महलों का स्वामी होता है। ऐसे मनुष्य घर के बाहर बगीचा, घर में जलाशय एवं सुंदर कलात्मक ढंग से बने भवन का स्वामी इस योग में जन्मा मनुष्य होता है।

(6) जातकतत्वम् 4 / 91 के अनुसार चतुर्थेश व लग्नेश दोनों चतुर्थ स्थान में हों तो मनुष्य को अकस्मात् घर की प्राप्ति होती है। ऐसा घर प्राय: दूसरों द्वारा बना-बनाया होता है।

(7) जातकतत्वम् 4 / 99 के अनुसार चतूर्थ स्थान या चतुर्थेश दोनों चर राशि (1, 4, 7, 10) में हो, चतुर्थेश शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो ऐसा जातक बहुत-से मकानों में रहता है एवं मकान बदलते रहते हैं यदि चर की जगर स्थिर राशि (2, 5, 8, 11) हो तो जातक के स्थाई मकान होते हैं।

(8) बृहत्पाराक्षर अ. 20 / श्लोक 10 के अनुसार भाग्येश, द्वितीय भाव में और द्वितीयेश भाग्य भाव में परस्पर परिवर्तन करने बैठें तो इस योग में जन्मे जातक का भाग्योदय 12वें वर्ष में होता है। बत्तीसवें वर्ष के बाद जातक को वाहन, मकान और नौकर-चाकर का पूर्ण सुख मिलता है।

(9) बृहत्पाराशर होराशास्त्र 15 / 3 के अनुसार यदि सुखेश स्वगृह, स्वनवांश, स्वोच्च में हो तो उस जातक को गृहभूमि, सवारी, खेती, माता आदि से पूर्ण सुख तथा बाजे आदि (संगीत विद्या) से भी सुख समझना।

गृहप्रवेश का उपयुक्त समय :

  1. गृहप्रवेश माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठमास में करना चाहिए। कार्तिक और मार्गशीर्ष में गृहप्रवेश मध्यम है। चैत्र, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और पौष में गृह प्रवेश करने से हानि तथा शत्रुभय होता है। माघ मास में गृहप्रवेश करने से धन का लाभ होता है। फाल्गुन मास में गृहप्रवेश करने से पुत्र और धन की प्राप्ति होती है। वैशाख मास में गृह प्रवेश करने से धन-धान्य की वृद्धि होती है। ज्येष्ठ मास में गृहप्रवेश करने से पशु और पुत्र का लाभ होता है।
  2. जिस घर का द्वार पूर्व की ओर मुखवाला हो, उस घर में पञ्चमी, दशमी और पूर्णिमा में प्रवेश करना चाहिए। जिस घर का द्वार दक्षिण की ओर मुखवाला हो, उस घर में प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथियों में प्रवेश करना चाहिए। जिस घरका द्वार पश्चिम की ओर मुखवाला हो, उस घर में द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियों में प्रवेश करना चाहिए। जिस घर का द्वार उत्तर की ओर मुखवाला हो, उस घर में तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियों में प्रवेश करना चाहिए। चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या- इन तिथियों में गृहप्रवेश करना शुभ नहीं है।
  3. रविवार और मंगलवार के दिन गृहप्रवेश नहीं करना चाहिए। शनिवार में गृहप्रवेश करने से चोर का भय रहता है।

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