पूर्वजन्म, पुनर्जन्म – ज्योतिषीय विश्लेषण

पुनर्जन्म का अर्थ है- एक शरीर का त्याग करके दुबारा जन्म लेना। इसके अनेक कारण होने पर भी, प्रधानत: अपने शुभाशुभ कर्मों की वासना ही मुख्य कारण है। हिन्दु धर्म में पुनर्जन्म सिद्धान्त का एक प्रधान स्थान है। वेद-वेदाङ्ग, दर्शन, स्मृति, पुराण सर्वत्र इसे देखा जा सकता है। चार्वाक-दर्शन के अतिरिक्त और सभी दर्शन उसे मानते हैं। मैक्समूलर कहते हैं कि ‘मानवता के सर्वोत्तम चिन्तकों ने पुनर्जन्म सिद्धान्त को स्वीकार किया है।’

फलित ज्योतिष का आधार ही पूर्वजन्म-सिद्धान्त है। कुण्डली का पंचम भाव व कुण्डली के योगायोग व्यक्ति के पूर्वजन्मों को संचित बतलाते है।

ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक पाराशर आदि महर्षियों तथा वराहमिहिरादि आचार्यों ने भी मरणोपरान्त इस जीव का पुनर्जन्म कहां होगा- इस बात का योग दृष्टि से जो निर्णय दिया है, उसका दिग्दर्शन कराया जाता है। सर्वप्रथम पूर्वजन्मकालीन लोकज्ञान के विषय में ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से विचार करते हैं। आचार्य वराहमिहीर (बृहज्जातक 25/14) के अनुसार

गुरुरुडुपति शुक्रौ सूर्य भौमौ यमज्ञौ, विबुधपितृतिरश्चो नारकीयांश्च कुर्यु:।
दिनकरशशि वीर्याधिष्ठित त्र्यंशनाथात्, प्रवरसमनिकृष्टा स्तुङ्गह्रासादन् के॥

गुरु, चन्द्र, शुक्र, सूर्य, मंगल, शनि बुध- ये ग्रह क्रमश: देवलोक, पितृलोक, तिर्यकलोक (मत्र्यलोक) एवं नरकलोक- इनसे आये हुए प्राणीयों को सूचित करते हैं। इसे देखने की रीति इस प्रकार है कि जन्मकाल में सूर्य और चन्द्र- इन दोनों में से जो बली हो, वह जिस द्रेष्कांण में हो उस द्रेष्कांण का स्वामी गुरु हो तो यह प्राणी देवलोक से आया है- ऐसा समझना चाहिए। यदि चन्द्रमा या शुक्र उक्त द्रेष्कांण के स्वामी हों, तो पितृलोक से, यदि सूर्य एवं मंगल उक्त द्रेष्कांण के स्वामी हों तो तिर्यक (मत्र्य) लोक से और यदि शनि या बुध उक्त द्रेष्काणपति हों तो प्राणी नरकलोक से आया है- ऐसा समझें।

अब ‘पूर्वजन्म में प्राणी किस प्रकार का था’- इस विषय में विचार करते हैं। यदि उक्त लोकों से आये हुए प्राणियों को सूचित करने वाले ग्रह अपने उच्च के समीप स्थानों में स्थित हों तो प्राणी अपने पिछले जन्म में देवादिलोकों में भी श्रेष्ठ था। यदि वही ग्रह अपने उच्च-नीच के मध्य में स्थित हो तो उन प्राणियों को वहां देवादि लोक में भी मध्यम श्रेणी का समझें। यदि वही ग्रह नीच के समीप स्थानों में स्थित हों तो देवादि लोक में भी वह नीच श्रेणी का था। मरणोपरान्त जीव की गति के स्थान ज्ञान के विषय के सन्दर्भ में आचार्य वराहमिहीर बतलाते है (वृहज्जातक 25/15)-

जिसके जन्म लग्न से षष्ठ-सप्तम और अष्टम स्थानों में जो ग्रह स्थित हों, उनमें जो बलवान हो, उसका जो पूर्वश्लोक में कथित लोक है, उस लोक में मरने के बाद प्राणी जाता है। यदि षष्ठ, सप्तम और अष्टम इन स्थानों में कोई ग्रह न हो तो छटे, आठवें इन दोनों स्थानों में जिन द्रेष्काणों का उदय हो, उन दोनों द्रेष्काणों के स्वामियों में जो बली हो, उसका जो पूवोक्त देवादि लोक कहा है वह उस लोक में जाता है।

ज्योतिष के अन्य सिद्धान्त के अनुसार जन्म में लग्न में अष्टम स्थानगत केवल शुभ-ग्रह हों तो भी मरणोपरान्त शुभ गति प्राप्त होती है। यदि जन्म में शुभ गतिप्रद ग्रह स्थित हो, मरण लग्न में अशुभ हो जाये तो वह मध्यम लोकों में जाता है। जन्म और मरण दोनों काल की ग्रह स्थिति अशुभ हो तो अधोगति (नरकलोकादि) होती है।  इसी प्रकार-

लग्नेशितु: स्वो्चसुहृत्स्वगेहात्, तदीश्वरो याति मनुष्यजन्म।
समे मृगा: स्युर्विहगा: परस्मिन्, द्रेष्काणरूपैरपि चिन्तनीयम्॥

लग्नेश की उच्चराशि में, लग्नेश के मित्र ग्रह की राशि में अथवा लग्नेश की अपनी राशि में नवमेश, पञ्चमेश हो तो उस व्यक्ति का पुनर्जन्म मनुष्य योनि में होगा यदि सम ग्रह की राशि में हो तो मृगादि पशुयोनि में पुर्नजन्म होगा तथा अन्य ग्रह की राशियों में हो तो पक्षियों की योनियों में जन्म जानना चाहिए। इसी प्रकार द्रेष्कांण पर से भी यह विचार करना चाहिए।

तावेकराशौ जननं स्वदेशे, तौ तुल्यवीयौं यदि तुल्यजाति:।
वर्णो गुणस्तस्य खगस्य तुल्यं, संज्ञोदितैरेव वदेत समस्तम्॥

यदि दोनों ग्रह (नवमेश, पंचमेश) एक राशि में बैठे हों तो स्वदेश में जन्म जानें। यदि वे दोनों ग्रह समान बली हों तो उसी अपनी जाति में जन्म जानें। उसका वर्ण-गुण आदि सम्पूर्ण विचार उस ग्रह के अनुसार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संज्ञा प्रकरणोक्तवत् समस्त कहना चाहिए।

पाराशर ने तो अष्टम स्थान का उल्लेख ‘पूर्वापर जनुर्वृत्तम’ के रूप में बतलाया है जिसका अर्थ है पूर्व जन्म की जीवन वृत्ति, व्यवसाय आदि।

ऋषि पाराशर व आचार्य वराहमिहीर दोनों ने ही स्पष्ट रूप से पूर्वजन्म, इह जन्म तथा पुनर्जन्म का विवरण दिया है। उत्तर भारत की प्रचलित ‘भृगु संहिता’ तथा दक्षिण भारत के नाड़ी ग्रन्थ, ‘अगत्स्य संहिता’ इत्यादि में पूर्व जन्म का वर्णन मिलता है। ‘कर्म विपाक संहिता’ नामक एक ज्योतिष ग्रन्थ में मनुष्य के पूर्वजन्म के सम्बन्ध में, उसके जन्म नक्षत्र (चन्द्रमा) के चरण के आधार पर ज्ञान करने की विधी का वर्णन है।

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